Wednesday, February 25, 2009

जननायक की यादें

प्रत्येक दिन जब वे पटना में रहते थे, सुबह साढे सात बजे मिलने जाया करता था। ठीक साढे सात बजे तैयार होकर जननायक अपने सरकारी आवास के नीचे बरामदे पर लगे कुर्सी, बड़े से टेबुल, जो कहीं कटे, कहीं टूटे थे आकर बैठ जाते और गरीबों के हुजूम जिनके तन पर साफ़ कपड़े नहीं, कईयों के पैर में चप्पल नहीं आकर घेर लेते, अपना दुख़ड़ा, तकलीफ़ पीड़ा सुनाने लगते। उसी भीड़ में दल के कार्यकर्ता एवं उनसे मिलने वाले सहयोगी टेबुल के बगल में लगे बेंच पर बैठ जाते, समस्याओं से सम्बन्धित अधिकारियों, सरकार के मंत्रियों को दूरभाष के द्वारा या फ़िर पत्र के द्वारा न्याय देने का निवेदन किया करते थे। वे आने वाले लोगों का बड़े नम्र भाव से यह भी समझाते थे कि जब हम आपके यहां आने वाले हैं तो पैसा ख़र्च कर क्यों चले आये। वहीं आकर अपनी समस्याओं को बताते।
पटना में रहने पर देर रात भी उनसे मिलने जाया करते था। अपने आवास के उपर बरामदे में लगे चौकी पर लेटे रहते। माथे और शरीर दबाने वाले दबाते रहते थे। चौकी के सटे लकड़ी का टेबुल जिसपर बैठने का निर्देश मिलता, हाल चाल होता। अगले दिन के कार्यों के लिये भी निर्देश होता।
एक रात जब उनसे मिलकर चलने का आदेश लेना चाहा तो निर्देश हुआ कि छः बजे आ जायें। मुझे लगा सुबह कहीं कार्यक्रम में जाना है। चुंकि अक्सर मुझे अपने साथ ले जाया करते थे, इसलिये मैं भी तैयार होकर ठीक 6 बजे सुबह पहुंचकर जैसे ही मोटरसाईकिल बन्द कर ख़ड़ा करने लगा वैसे ही जननायक की आवाज, चलिये। अचरज भरे निगाह से देख़ा। दबे आवाज में मैने प्रश्न किया गाड़ी तो अभी आयी नहीं है, उन्होंने कहा कि आप के मोटर साइकिल से ही चलेंगे। यह सुनकर मैं हतप्रभ रह गया, मानों सारे शरीर का ख़ून ही जाम हो गया हो। थोड़ी देर के लिये शून्यता की स्थिति में चला गया, फ़िर उन्होंने आवाज दी- स्टार्ट करिये। बड़ी हिम्मत और साहस और अपने आप को नियंत्रित करते हुए मोटर साइकिल स्टार्ट किया। बैठने के क्रम में पीछे लगे कैरियर से उनके पैर छिल गये। मैंने अफ़सोस एवं दुख़ प्रकट किया लेकिन उन्होंने कहा मेरा कद छोटा है इसलिये ऐसा हुआ, चलिये कोई बात नहीं। बैठने के बाद दोनों हाथ मेरे कंधों पर, आदेश हुआ बेली रोड से चलने का।
उस समय अजीबो गरीब स्थिति में था जब सड़क से चलने वाले, पैदल हों या गाड़ी से हों, साइकिल से हो सभी लोग जननायक को मोटर साइकिल से जाते देख़कर अविश्वसनीय नजरों से देख़ रहे थे। मानों विश्वास ही नही हो रहा था कि इतने बड़े राजनेता मोटर साइकिल से चले यह नहीं हो सकता। आपस में तर्क वितर्क, सही गलत होने लगी। कईयों ने उंगली से इशारा कर बताना चाहा कि देख़ें कर्पूरी ठाकुर मोटर साइकिल से जा रहे हैं। कईयों ने सर झुकाकर अभिवादन किया, कईयों ने हाथ उठाकर प्रणाम किया।
चलने के क्रम में ही उन्होंने बताया कि कई दिनों से विदेश के कुछ पत्रकार मुझसे मिलने आये हैं पर समय न रहने के कारण उन्हें प्रेसीडेंट होटल में ठहरने का आग्रह किया और उन्हें वादा किया था कि सुबह छः बजे मैं स्वयं होटल में ही आकर बात कर लूंगा।
जैसे ही होटल के पास मोटर साइकिल रुकी, जननायक को देख़कर लोग दौड़ने लगे, होटल के प्रबंधक एवं कर्मचारियों ने आकर अभिवादन किया। जब विदेशी पत्रकार को जानकारी मिली कि जननायक दिये गये समय पर आ गये वह भी मोटर साइकिल से तब अकस्मात उनके मुंह से निकल गया- “You are really a leader of down trodden people. We have not seen any leader as you in the entire world”।
अपने विशाल व्यक्तित्व एवं बड़े राजनेता होने का एहसास गरीबों के आवाज बनने में कभी और कहीं भी बाधक नहीं माना, यही कारण रहा कि गरीबों के आवाज को मजबूती प्रदान करने में साधन नहीं, अपने आपको साध्य मानकर आगे बढते गये। लक्ष्य तक पहुंचने में रास्ते चाहे जैसा हो इसकी परवाह नहीं की। न रात देख़ा न दूरी देख़ी, न साधन देख़ा न मुसीबतें देख़ी, निर्भिक होकर सीना फ़ैलाकर, पैर अड़ाकर लड़ने और संघर्ष से तनिक भी नहीं रुके। पूरी जिंदगी ही मानों गरीबों, असहायों, वंचितो के लिये गिरवी रख़ दी हो। ऐसे जन नेता को शत शत नमन।

डा0 निहोरा प्रसाद यादव
प्रांतीय महासचिव, राजद
पटना, बिहार

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