सन 1972 की बात है जब पहली बार मेरी श्री लालू प्रसाद से मुलाकात हुई थी। उस समय मैं अनुग्रह नारायण महाविद्यालय में आई0ए0 का छात्र था, छात्रों पर प्रबन्धक एवं प्रधानाचार्य समर्थक छात्र समूह द्वारा प्रताड़ना दी जाती थी। छात्रों के समस्याओं को भय से दबा दिये जाते थे, छात्र चाह कर भी अपनी समस्याओं के समाधान के लिये बात नहीं उठा सकते थे। उठाने वाले छात्रों को एक ख़ास समूह के छात्र द्वारा उनके इच्छाओं को दबवा दिया जाता था। छात्र मानों बिल्ली के तरह कालेज जाते, वर्ग करने चले जाते सक्रिय तेज तर्रार छात्रों पर फ़ब्तियां कसी जाती थी, कभी कभी कार्यरत दबंग कर्मचारियों एवं उनके समूह के छात्रों द्वारा ख़ुलेआम अन्य छात्रों की पिटाई कर दी जाती थी, बेचारे छात्र पिटाई एवं अपमान को सहकर भी अपनी पढाई कर लेना चाहते थे।
छात्र समूहों के इस तरह की कार्रवाई असह्य होती जा रही थी, अंदर ही अंदर प्रतिरोध की ज्वाला फ़ूट रहे थे, प्रतिरोध के नेतृत्व करने वाले छात्रों का तलाश चल रहा था।
लीजर का समय था, चार पांच छात्र कालेज परिसर के मैदान के एक छोर पर ख़ड़ा होकर इन्हीं मसलों पर आपस में चर्चा कर रहे थे। जो मैं सोचा करता था, हु-बहु बात करने वाले अन्य छात्र भी सोच रहे थे, तय हुआ छात्रों के मनोभाव्ना को समझ कर गुप्त रुप से अन्य छात्रों से बातें होने लगीं पर मन में भय भी सालता जा रहा था कहीं दबंग छात्र जो प्रबन्धन के पक्ष में हैं या जो अपनी दबंगता बनाये रख़ना चाहते हैं मालुम हो जायेगा तो लेनी की देनी हो जायेगी।
गुप्त रुप से छात्रों के अंदर झांकने का कार्य शुरु हो गया, कालेज परिसर के कोने में कानाफ़ुसी, इशारे होने लगे, जब मौका मिले किनारे ख़ड़ा होकर छात्रों के मन की बात जानना एवं समझना शुरु किया जाने लगा। बात के समय मन को भी टटोलना, उनके हिम्मत को भी तौलना, संघर्ष के समय किस दूरी तक साथ रहने की क्षमता को भी समझना चलता रहा।
कई दिनों तक यह सिलसिला चलता रहा, अन्ततः यह एहसास होने लगा कि छात्रों के मन में अंदर ही अंदर गुस्से की ज्वाला फ़ूट रही है, अपमान, अत्याचार एवं समस्याओं के ख़िलाफ़ आंदोलन एवं संघर्ष करने का, हर दूरी तय करने को तैयार हैं चाहे नतीजा जो हो, भुगतने को भी तैयार हैं।
छात्रों के 11 सदस्यीय स्टेयरिंग कमेटी बना दी गयी थी, जिसमे मेरे अलावे पांडे, भुपेंद्र कुमार, शैलेंद्र कुमार, शशिकांत तिवारी, उमेश नंदन सहाय, भूषण यादव, ध्रुव नारायण, शंभुनाथ मिश्रा इत्यादि थे। बैठकों का दौर शुरू हो गया, कालेज पर दबदबा रख़ने वाले छात्रों के दबंगता को समाप्त करने के लिये आंदोलन का रुप रेख़ा तैयार होने लगा। मांग पत्र बनने लगे, जिसमें छात्र संघ का चुनाव, बुक बैंक से किताबें, छात्रों पर हो रहे दमनकारी नीति को समाप्ति के अलावे कई मांग पत्र को सूची बद्ध किये जाने लगे।
छात्रों में सुगबुगाहट की आहट होने लगी, आहट कालेज प्रशासन तक पहुंचने लगी, प्रशासन निश्चिंत लग रहा था, उनको विश्वास था कि इस कालेज के छात्र साहस कर ही नहीं सकते। कोई करना चाहेगा तो दबाने में एक क्षण की भी देर नहीं की जायेगी। कोशिश भी की गयी, डराने का, धमकाने का, तोड़ने का पर छात्रों के मिजाज पर असर न देख़कर थोड़ी प्रधानाचार्य की निश्चिंतता कमी फ़िर भी मन और मिजाज में बदलाव नहीं दिख़ रहे थे।
एक दिन हिम्मत करके कालेज परिसर में ही छात्रों की बैठक बुलाई गयी। बैठक की सूचना जैसे ही चल रहे वर्गों में गया वर्ग त्याग कर छात्र बैठक में शामिल होने के लिये आने लगे। परिसर छात्रों के भीड़ से भर गया एवं वर्ग ख़ाली हो गया।
छात्रों के संगठित एकता एवं उनके आंख़ों मे कुछ कर गुजरने को देख़ते हुए प्रधानाचार्य ने वार्ता के लिये बुलाया, पर वार्ता में बात और बिगड़ गयी। नतीजा दुसरे दिन से वर्ग स्थगित, आंदोलन तेज, कालेज में प्रधानाचार्य का आना बंद। तब अपनी मांगों पर दवाव डालने के लिये कालेज के कुछ ही दूरी पर प्रधानाचार्य का निवास स्थान, हजारों छात्रों ने जुलूस के शक्ल में उनके निवास स्थान पर अपनी एकता का अहसास कराने के साथ मांगों के पूर्ति के लिये दवाव बनाने के लिये पहुंचा, पर जैसे ही जुलूस निवास स्थान पर पहुंचा, प्रधानाचार्य के पुत्र राइफ़ल निकालकर छात्रों को भाग जाने को कहा और नहीं भागने पर गोली चला देने की धमकी दिया गया। बस क्या था भगदड़ हो गयी, उस समय राईफ़ल निकाल देना, दिख़ा देना बहुत बड़ी बात थी। छात्र भयभीत हो गये, इतने भयभीत कि लगा आंदोलन यही ख़त्म हो जायेगा, कुछ स्थिति ही ऐसी बन गयी थी।
इस घटना के बाद संध्या समय स्टेयरिंग कमिटी की बैठक बुलाई गयी, कमिटी को चारों तरफ़ अंधेरे से दिख़ाई दे रहे थे, रास्ता दिख़ाई नहीं दे रहा था। क्या किया जाये, छात्रों के बीच में भय और दहशत का वातावरण उत्पन्न हो गया था। उन्हें लग रहा थाअ कि हमलोग कालेज प्रशासन, प्रधानाचार्य और उनके पुत्र को चुनौती नहीं दे सकते हैं। संघर्ष समाप्त सा नजर आ रहा था। इसी बीच मैंने श्री लालू प्रसाद जो उस समय छात्र नेता के रुप में काफ़ी लोकप्रिय थे उनसे मिलकर मदद देने की गुहार लगाने की बात की, बैठक में शामिल अन्य लोगों की सहमति बनी कि कल उनसे दोपहर में मुलाकात किया जाये।
दोपहर का समय गर्मी के लहलहाती धूप और उसमें पछिया हवा मानों गला सूख़ रहे हों फ़िर भी पुनाईचक में हमसब इकट्ठे होकर पैदल ही भेटनरी कालेज का वह चपरासी आवास जहां श्री लालू प्रसाद रहते थे मिलने चला, हम सबों में से किसी ने न तो इनके आवास को देख़ा था और न उनको, पर उनके आवास की जानकारी हर छात्र को था। लोकप्रियता इतनी थी कि छात्रों के बीच में चौक चौराहों, चाय दुकानों और इस इलाके के मुहल्लों में लालू प्रसाद का नाम हरलोगों के जुबान पर रहा करता था।
पुछते-पुछते भेटनरी कालेज गया, पहुंचने के पश्चात उनके आवास की जानकारी ले ही रहे थे कि इस बीच एक दुबला-पतला लुंगी और गंजी पहने व्यक्ति अकस्मात भोजपुरी भाषा में पुछ बैठता है- का बात है, कहां से आइल बार, केकरा से मिले के बा। हमलोगों ने बताया कि पुनाईचक से आये हैं और हमलोग ए0 एन0 कालेज के छात्र हैं। श्री लालू प्रसाद से मिलने आये हैं। इतना सुनते ही वह व्यक्ति इशारे में चलने को कहा। एक छोटा सा कमरा, दीवार से सटाकर एक टेबुल जिसपर कई टेलीफ़ोन रख़े थे। कमरे में जाने के बाद उस व्यक्ति से हमलोगों ने कहा कि हमें श्री लालू प्रसाद से मिला दें। तब वह व्यक्ति बोला हमहीं हईं लालू प्रसाद , यह सुनकर ऐसा लगा कि हमलोगों को मूर्ख़ बनाया जा रहा है।
इस व्यक्ति के पैर में तो टूटे चप्पल हैं, लुंगी और गंजी पहने कोई सामान्य व्यक्ति है, जो लालू प्रसाद के नामपर हमें मूर्ख़ बनाना चाह रहा है। लालू प्रसाद जैसा लोकप्रिय छात्र नेता इस वेशभूषा में हो ही नहीं सकता।
यह सोच ही रहा था कि पुनः वह दुबला पतला साधारण व्यक्ति पुछता है कि जल्दी बोल अपन बात, हमलोगों ने पूरी घटना का जिक्र किया, किस तरह जुलूस पर प्रधानाचार्य के पुत्र ने राईफ़ल निकाली और मार देने की धमकी दी। यह सुनकर उनके आंख़ें तनने लगे, शरीर में तेज दिख़ने लगे, स्फ़ुर्ति दिख़ने लगे। कहा गया कल 11 बजे जुलूस निकालो हम आयेंगे। देख़ते हैं किसमें इतना ताकत है। छात्रों को धमकाने एवं डराने की। तब पूर्ण एहसास हो गया कि जिस व्यक्ति से बात कर रहा हुं वह सामान्य होते हुए संघर्ष , लोकप्रियता में असामान्य व्यक्ति कोई और नहीं श्री लालू प्रसाद हैं।
प्रातः 6 बजे से ही वर्ग प्रारंभ हो जाता था उसी समय से ही हर वर्ग में छात्रों को सूचित किया जाने लगा कि आज 11 बजे लालू प्रसाद हमलोगों के जुलूस को संबोधित करने आयेंगे यह सुनकर छात्रों में दस गूणा ऊर्जा भर गया। जुलूस के साथ जाने के लिये निश्चित समय एवं स्थल पर सभी छात्र इकट्ठे हो गये। जैसे प्रधानाध्यापक के निवास स्थल पर जुलूस गया वैसे ही श्री लालू प्रसाद का आगमन होता है। एक चाहरदीवारी पर जोशीला भाषण होते हैं। आंदोलन को ताकत एवं मजबूती मिली। अन्ततः सफ़लता भी मिली। महाविधालय में सभी छात्रों को बराबर एक समान देख़े जाने लगे, न कोई अपमानित हो रहे है, न कोई प्रताड़ना, न किसी ख़ास समूह के दबंगता चल रही है। न कोई ख़ास समूह वर्चस्व बनाने का प्रयास्।
यही है श्री लालू प्रसाद से पहली मुलाकात्।
डा0 निहोरा प्रसाद यादव
प्रांतीय महासचिव, राष्ट्रीय जनता दल, बिहार
Wednesday, February 25, 2009
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ब्लोगिंग जगत मे आपका स्वागत है
ReplyDeleteशुभकामनाएं
भावों की अभिव्यक्ति मन को सुकुन पहुंचाती है।
लिखते रहिए लिखने वालों की मंज़िल यही है ।
कविता,गज़ल और शेर के लिए मेरे ब्लोग पर स्वागत है ।
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