छुटा पटाखा ................
यह कहानी ऐसे गरीब परिवार का है जो परिश्रम कर दो शाम की रोटी अपने परिवार एवं बच्चों को दे पाता है, पर्व के अवसर पर दिए जाने वाले सामग्री की पूर्ति आभाव के कारण नहीं कर पाते, लेकिन इनके बच्चे इस आभाव से बिल्कुल अनिभिग्य रहते, मतलब नहीं रखते, मतलब सिर्फ पर्व के अवसर पर पड़ोस के बच्चों के लिए की गई खरीदारी स्वयं के लिए भी अपने पिता से आशा रखता है और उसी आशा भरी नज़र से पिता को भी देखता है कि जब उसके पिता लाये तो मेरे लिए भी लाया जायेगा।पिता परदेश में काम करते हैं, वहीँ से घर खर्च के लिए पैसा भेजता है, पर्व के अवसर पर घर आते हैं।दीपावली आनेवाले थे सबों के घर में साफ सफाई, पोती, रंग रोगन हो रहे थे, कोई चूना से अपने घर को पोत रहा था, को लाल मिटटी से घर पोत रहा था, तो कोई गोबर से ही घर को पोत रहा था, जिसका जिस तरह का सामर्थ्य था उस तरह दीपावली कि तैयारी के लिए घरों को साफ सफाई पोताई किये जा रहे थे। बच्चे-बच्चियां घरौंदा बनाती और खूब फटाखा फोड़ने की बात आपस में करते। इसमें सुखु नाम का वह बच्चा भी था जिनके पिता परदेश में कमाते थे, माँ के साथ रहता था, अपने पिता के हालत को वह नहीं समझता था क्योंकि बच्चा था। बच्चों के आपसी चर्चा से सुखु के मन में भी उत्सुकता हुआ कि पिता जी दीपावली में आयेंगे बहुत सारे फटाखे लायेंगे, में भी अन्य बच्चों के तरह उनके बीच में फोदुगा।दीपावली के दो दिन पहले से ही सुखु माँ से पटाखा लेने का जिद्द करने लगा, उसके जिद्द को यह कह कर माँ टालती गयी कि अभी दो दिन बाकी है पिताजी लेकर आयेंगे, यह सुनकर सुखु के चेहरे खिल उठते खुशियों से कूदने लगता चिल्लाने लगता हम भी ढेर सरे पटाखे छोडेंगे।दीपावली के सुबह सुखु उठता है। माँ से पूछता है माँ पिता जी आये माँ निरुत्तर हो जाती है। सुखु कहता है माँ आज ही दीपावली है। सबों का पटाखा आ गया है, मेरा भी आ जायेगा न, माँ फिर भरोसा दिलाती हैकि हाँ शाम तक तुम्हारे पिता जी लेकर आ जायेंगे। यह सुनकर कूदने गली में जाता है अपने दोस्तों को कहता है हमारा भी फटाखा शाम तक पिताजी लेकर आयेंगे।इसी बीच खबर आती है कि सुखु के पिताजी नहीं आ पाएंगे क्योंकि जहाँ वह काम करते थे पैसा नहीं मिल पाया था यह सुचना पाकर सुखु कि माँ बहुत मायूस हो गयी, एक तरफ पटाखा के बच्चे का जिद्द और दुसरे तरफ घर में खाने के लिए एक छटाक अनाज नहीं, बडी मुश्किल हो गयी, सुखु का जिद्द तो पूरा करना असंभव है, रहा किसी तरह घर में चूल्हा जलाना वह तो सेठ जी से उधार लेकर भी कर लूंगी, यही सोच में बैठी रही। संध्या होने वाला था इसी बिच सुखु फिर माँ के पास आकर कहता है। माँ पिताजी कब आयेंगे शाम होने जा रहा है कब पटाखा आएगा, कब छोदुँगा। कभी माँ का गाल पकड़कर उत्तर चाह रहा था कभी उनके माथे का बाल नोच कर उत्तर चाह रहा था, पर उसकी माँ चुपचाप मूर्ति की तरह बैठी थी। उत्तर न मिलने पर सुखु हाथ, पैर पटककर रोने लगा, तब माँ बोले बेटा अभी में जाकर ला देती हूँ।सूर्यास्त हो चूका था सभी के मकानों पर दीपक जलाने की तैयारी हो रही थी, सुखु की माँ हाथ में झोला लिए सेठ जी के दूकान पर जाती है कहती है सेठ जी सुखु के पिताजी नहीं आ पाए हैं। घर में खाने के लिए एक छटांक अनाज नहीं थोडा नहीं है थोडा उधार दे दें तो उनके आने पर पैसा दे देंगे। यह सुनते ही सेठ जी आगबबूला हो गया कहने लगा कि पहले का पैसा तो मिला नहीं अब कहाँ उधार दूंगा। सुखु की माँ कहने लगी कि सेठ जी आज पर्व का दिन है, विश्वास दिलाती हूँ कि उनके आते ही सबसे पहले आप का ही क़र्ज़ चूका दूँगी। लाख समझाने के बाद सेठ जी नहीं माने बेचारी उदास होकर घर लौटने लगी, मन ही मन सोच रही थी कि हम तो भूखे रह सकते हैं मेरा सुखु कैसे भूखे रह सकता है, जैसे ही अपने घर के दरवाजे पर पैर राखी वैसे ही सुखु दौड़ता हुआ आया कहने लगा माँ फटाखा लायी कभी माँ के कमर को देखता जब कही नजर नहीं पडा तो रोने लगा बच्चा को रोते देख मनो उसकी माँ का कलेजा ही दो फांक हो गया।गाँव में फटाखा छोड जाने लगे फट फट ,सर सर कि आवाज गूंजने लगी सुखु रोते हुए कहने लगा माँ सभी फटाखे छोड़ रहे हैं हम कब छोडेंगे। माँ दिलासा दिलाती रही सुखु रोता रहा यह क्रम नौ बजे रात्रि तक चलता रहा। सुखु रोते रोते सो जाता है। भूख की चिंता न थी न आज उसे लगा। सुखु कि माँ भी किवाड़ बंद कर बेटे को कलेजे से लगा कर सो जाती है।सुबह छः बजे सुखु की माँ की नींद खुलती है। नींद खुलते सुखु को न देख घबडा जाती है। चारो तरफ नजर दौड़ने लगती है, घर का किवाड़ खुला, सुखु नहीं और भी बेचैनी बढ़ी। इसी बीच पहने हुए कुरता में कुछ लेकर सुखु आता है , माँ दौडी बेटा कहाँ चला गया सुखु ने कुरता में लाये चीजों को दिखाते हुए कहा माँ यह फटाखा हिया। माँ बोलती है नहीं बेटा यह फटाखा नहीं, छूटा फटाखा है।
Tuesday, March 31, 2009
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