Saturday, November 7, 2009

Saturday, July 25, 2009

Tuesday, March 31, 2009

२५ तुगलक रोड, नयी दिल्ली, १० जून २००७, रात्रि ८:३० बजेराष्ट्रीय कार्यकारिणी का भोज। कुर्सियां लगी थीं, मंच बने थे, जिसपर कव्वाली गाने वाले बैठे थे , साज बजा रहे थे, में सबसे पीछे लगे कुर्सी पर बैठकर देखता रहा, मालूम हुआ कि १२ बजे रात्रि के बाद केक कटे जायेंगे। मेरी जिज्ञासा बढ़ी कि आज अच्छे अच्छे गोरे गोरे और बढिया पोषक वालों को देखने का अवसर मिलेगा। ठंढे पानी, लस्सी, जूस एवं तिनका लगाकर खाने का सामान बैठे लोगों को दिया जा रहा था, खड़े लोगों को भी दिए जा रहे थे। कव्वाली शुरू हुआ, एक दुसरे का जवाब तलब जन्मदिन के बधाई के साथ शुरू हुआ। सुरेन्द्र शर्मा के साथ कई हास्य कवि अपनी हास्य कविता से लोगों को हंसाते हंसाते पेट में दर्द कर दिया था।
में आशा से देखता रहा कि कब अच्छे अच्छे एवं गोरे, अच्छे पोषक वाले आयेंगे, में अपने इर्द गिर्द, अगल बगल] आगे पीछे व मुख्या द्वार की ओर टकटकी लगा देखता रह गया, पर मेरी आँखें थक गयीं। खाने का हुक्म हुआ, माकन के पीछे कई तरह के ब्यंजन लगे थे। मुझको लगा कि खाने के स्थान पर मिलेंगे, पर निराशा ही मिली। अपने मन को सांत्वना दिलाया, ११ बजे रात्रि के बाद केक काटना है, उस समय ही लोग आयेंगे। १२ बज चूका था, केक टेबल पर रखने कि तयारी चलने लगी, तब लगा, आ ही रहे होंगे। केक कटे गए, जन्मदिन की बधाइयाँ, तली , गुलदस्ता, बुके एवं मालाएं दी जाने लगीं। में टकटक देखता रहा, मेरे मन में असहज की पीडा दौरान लगी। कोई नहीं आया। आया वाही जिनके वस्त्र गंदे थे। गरीबी, लाचारी, फिर भी सुदामा की तरह कृष्ण को देखने के लिए लालायित। उद्घोषणा हुआ कार्यकर्म समाप्ति का। लोग जाने लगे, इसी बीच एक नेता ने कहा कल श्रीमती सोनिया गाँधी, प्रधान मंत्री, मंत्रिगन, सांसदों एवं परिवार वालों के बीच में खाना है। तब फिर मेरा मन उद्देलित हुआ। कल अच्छे और महत्वपूर्ण लोग आयेंगे। साफ सुथरे और अच्छे डिजाईन वाले पोशाक देखने को मिलेंगे। पर सुना की सबको जाने की इजाजत नहीं है। यह सुनकर में धरातल पर आ गया। मेरा सपना टूट गया, काफी गमगीन हुआ। दिल्ली के अच्छे लोगों को नहीं देख पाउँगा। पटना जाकर लोगों को क्या बतलाऊंगा? घर में पत्नी पूछेगी - बहुत बडे एवं अछे लोगों को आप देखे होंगे, उस समय मुझे कितनी शर्मिंदगी होगी। यह सब मेरे मन में बिजली की प्रवाह से आ जा रहे थे। मन क्रोधी हो रहा था। तरह तरह की बातें दिमाग में विचरण कर रहे थे, मन को समझाने की कोशिश कर रहा था। इसी बीच मेरे मोबाइल की घंटी बजती है। समय ६:३० बजे संध्या उदास मन से मोबाइल खोल कर कान से लगाया, मेरे एक राजनितिक मित्र , आदेश हुआ की ७:१५ बजे तक २५ तुगलक रोड चले आयें। मन को विश्वास ही नहीं हो रहा था।
ठीक सात बजे गेट पर गया। अन्दर जाने का हुक्म हुआ। फिर वही कुर्सियां, कुछ सोफे और वही मंच जिसपर गीत गाने वाले कलाकार अपने गीतों से लोगों के मन को आनंदित कर रहे थे। हरियाणा का कृष्णलीला गान सुनकर मन मुग्ध हो रहा था। सुरेन्द्र शर्मा हास्य कवि भी लोगों को हंसी से झकझोर रहे थे।
मेरी आँखें मुख्या द्वार पर टिकी थीं, कैसे और कौन लोग आते हैं। श्रीमती सोनिया जी आयीं, प्रधानमंत्री आयें, मंत्री एवं संसद आये। रुके और चले गए। पर बडे और वजनदार अच्छे लोग नहीं आये। सारा मैदान और कुर्सियां अधिकतर उन्हीं लोगों से भरा पता था, जिनके पैर में जूते नहीं थे, पर में हवाई चप्पल, प्लास्टिक का चप्पल, शारीर पर गंदे पते कपडे, पुराणी मटमैली धोती, गर्मी से कपडे भींगे हुए, चेहरे गीली मानों अभी स्नान कर निकला हो। पसीने का दुर्गन्ध। यह देखर में अचंभित रहा तब में असलियत और हकीकत पर आया, जिस नेता के घर पर हैं वह नेता बडे लोगों का नहीं, बेसहारा, गरीब, दबे कुचले असहाय बेजुबान लोगों का है।
बैठे बैठे मेरा दिमाग उस दिवंगत नेता स्वर्गीय जननायक कर्पूरी ठाकुर को देखने लगा जिसके जीवन से लेकर मरण तक ऐसे लोग घेरे रहते थे। ठीक येही स्थिति पटना से १००० किलोमीटर दूर दिल्ली के २५ तुगलक रोड में देखने को मिला।

माँ

माँ नही रही, लेकिन ..............................माँ नही रही लेकिन उनके लाड प्यार और यादें मौजूद हैं। उनके प्यार मानों आज भी जेहन में घूम रहे हैं। रात में साथ में सुलाना बगैर खाए सो जाने पर उठाकर खिलाना, नींद से आँखें नही खुले तो एक हाथ में दूध रोटी और दूसरा हाथ सर के पीछे रखकर जबरन मुंह में डालना ताकि खाना पेट में जा सके। लाख कहने पर कि नही खाऊँगा, सोने दो, नही समझती कहती रात को भूखे नही सोना चाहिए, जबतक नही खा लेता वह भी नही खाती, जब कभी रूठता काफी दुखी एवं उदास रहती थी। रूठकर नही खता तो बगैर खिलाये वह नही खाती।छोटी सी खाट पर पुराने फटे साडी व धोती के हाथ से सिलाई किया बिस्तर, उसी तरह ओढ़ने का चादर, खाट इतनी छोटी कि सोने पर मानो उनके कलेजे में ही समां गया हूँ , अपने उंगलियाँ से माथा को सहलाना। जब उन्हें नींद खुलती मेरे माथे पर उँगलियों के द्वारा ढील खोजती। मिलाने पर उसे छोड़ती नही। उन्हें लगता था कि मेरे दुलारे को ढील खून चूस रहा है। गुस्सा हो दोनों नाखुनो के बीच में रखकर पीस देती तब जाकर राहत की साँस लेती, यह क्रिया लगातार घंटों रात में चला करता था।सुबह जब देर तक सोया रहता था तो वे उठाती कहती कौवा कब से बोल रहा, सबेरे उठा प्यार से उठाती, समझाती सूर्योदय के पहले ब्रह्ममुहूर्त में जागना चाहिए। इस समय शारीर को अच्छी हवा मिलती है। जिससे स्वस्थ्य ठीक रहता है। सूर्योदय के बाद उठाने से अधकपारी होता है, न उठाने की जिद करता पर उन्हें लगता मेरा बेटा सवेरे न उठकर कुछ खोने वाला है, हांलाकि जीत अंततः उन्ही की होती थी।थोडी सी छींक आने पर चिंतित हो जाती। बुखार आने पर डॉक्टर, वैद, ओझा, गुनी एक का भी दरवाजा नहीं छोड़ती, कभी गाँव के ब्यक्ति को बुलाकर नारी दिख्वाती बुखार कमा की नहीं है, तो वारली बना कर पिलाती, फुलकी रोटी, पुराने चावल के भात के साथ परवल का रस देती, जब खाने लगता तो उनके चेहरे पर खुशियाँ छलकने लगती।जारे के समय, सुबह गाती बांध कर रखती, बोरसी के पास ही बैठने को कहती, धुप आँगन में आते ही बोरा बिछा कर बैठती, फिर कभी पैर देखती कभी गर्दन देखती, कभी कान के बगल की और झांकती, माथे पर उगे केश पर हाथ फेरती, तब धीरे-धीरे बोलती पैर, गर्दन और कान में मेल बैठ गया है, माथे के केश में लत्ते हो गया है आज दोपहर स्नान करना होगा, फिर क्या था स्नान के नाम पर रोंगटे खड़े हो जाते, रोने लगता, बावजूद इसके समझकर राजी कर लेती।बरसात के दिनों में प्रत्येक रात पैर के उँगलियों के बीच देखती, कहती पैर में पानी लग गया है, मुर्दा शंख पीसकर खोलकर लगतीं, नहियल के तेल में कपूर डालकर लगाती। गर्मी में तो लू न लगे इसके लिए इसके लिए चिंतित रहती। इससे भी ज्यादा घमौरी और कलकल उन्हें चिंतित करता, जब घमौरी होता तो पुरे शरीर में लाल मिटटी लिपटी, कलकल हो जाने पर गाय के मूत्र पुरे शारीर में लगाती, आँख लाल होने या आ जाने पर कछुआ के हार को रगड़कर आँख में लगाती। तीनो ऋतू आने के पहले ही पूरी तैयारी कर लेती थी। सर्दी में पहले ही ओढ़ने का सामान और बोरसी बनाकर रख देती, बरसात के पहले मुर्दा शंख, गर्मी आने के पहले नीम का छाल का काढा बना कर रख देती थी, ताकि ऋतू परिवर्तन का असर न हो सके।गोइठा के आग पर उबले लाल दूध, उसी से बने दही के छाली, मक्खन और घी मिलाने और खिलने के लिए परेशां रहती, इससे भी ज्यादा परेशान जिउतिया के भोर में खाने वाले सरगाही के पुआ, मरुआ के रोटी उठाकर खिलाने को जिद करती, बगैर खिलाये स्वयं नहीं खाती।दुर्गापूजा, दीपावली एवं होली पर्व आनंद एवं खुशियाँ लेकर आता था जब दुर्गापूजा का नौरात्र शुरू होने वाला रहता था, उसके एक दिन पहले रात में नाभि में काजल का टीका लगा दिया जाता था, कपडा में हिंग बंधकर दाहिने हाथ के बांह में बांध दिया जाता था, धागे में नौ लहसुन का दाना गुंथकर गर्दन में पहना दिया जाता था और कहा जाता था की प्रत्येक दिन एक दाना खा लेना, ताकि दुर्गापूजा में कई तरह के डायन पिशाच अपने मनोकामना पूरा करने के प्रयास करते हैं। यदि यह सब पहने रहोगे तो कोई कुछ नहीं करेगा, दीपावली में पटाखा छोड़ते समय कही जले नहीं पास में खड़ी रहती थी। लुक्वारी फेंकने जाने को मन करती फिर भी जाया करता था। होलिका दहन के दिन से होली तक सक्रिय रहती थी कही कोई विवाद न हो जाये जब थोडा समय के लिए घर से निकला तो खोजने निकल जाती और पकड़कर घर ले आती। माँ पूरी जिंदगी अपने लिए नहीं जी मनो मेरे लिए जी रही हो, उनके नजर में हम कभी बडे हुए ही नहीं। बाप बन जाने के बाद भी मुझे छोटा बच्चा ही समझती थी वही बबुआ कहकर ही बुलाती थी, पास बैठती थी फिर वही माथे के केश पर हाथ फेरती थी। जब में माँ के पास नहीं बैठ पाटा था तो उनके मन में लगता था की हम नाराज हैं और मुझे सफाई देना पड़ता था। पत्नी की तल्ख़ आवाज पर तुंरत कर देती की हमारे बबुआ के साथ ऐसे नहीं बोलो, पत्नी भी बडी सेवा आदर और सम्मान करती थी।जबतक माँ रही बच्चा ही बना रहा। माँ नहीं है तो अब लग रहा है के जीवन का कई स्तर पार कर चूका हूँ। आज भी माँ अपनी ममता की चादर डाले हुए है जो इतनी वजनदार है की मुझसे हट नहीं पा रहा है।

छुटा पटाखा ................

छुटा पटाखा ................
यह कहानी ऐसे गरीब परिवार का है जो परिश्रम कर दो शाम की रोटी अपने परिवार एवं बच्चों को दे पाता है, पर्व के अवसर पर दिए जाने वाले सामग्री की पूर्ति आभाव के कारण नहीं कर पाते, लेकिन इनके बच्चे इस आभाव से बिल्कुल अनिभिग्य रहते, मतलब नहीं रखते, मतलब सिर्फ पर्व के अवसर पर पड़ोस के बच्चों के लिए की गई खरीदारी स्वयं के लिए भी अपने पिता से आशा रखता है और उसी आशा भरी नज़र से पिता को भी देखता है कि जब उसके पिता लाये तो मेरे लिए भी लाया जायेगा।पिता परदेश में काम करते हैं, वहीँ से घर खर्च के लिए पैसा भेजता है, पर्व के अवसर पर घर आते हैं।दीपावली आनेवाले थे सबों के घर में साफ सफाई, पोती, रंग रोगन हो रहे थे, कोई चूना से अपने घर को पोत रहा था, को लाल मिटटी से घर पोत रहा था, तो कोई गोबर से ही घर को पोत रहा था, जिसका जिस तरह का सामर्थ्य था उस तरह दीपावली कि तैयारी के लिए घरों को साफ सफाई पोताई किये जा रहे थे। बच्चे-बच्चियां घरौंदा बनाती और खूब फटाखा फोड़ने की बात आपस में करते। इसमें सुखु नाम का वह बच्चा भी था जिनके पिता परदेश में कमाते थे, माँ के साथ रहता था, अपने पिता के हालत को वह नहीं समझता था क्योंकि बच्चा था। बच्चों के आपसी चर्चा से सुखु के मन में भी उत्सुकता हुआ कि पिता जी दीपावली में आयेंगे बहुत सारे फटाखे लायेंगे, में भी अन्य बच्चों के तरह उनके बीच में फोदुगा।दीपावली के दो दिन पहले से ही सुखु माँ से पटाखा लेने का जिद्द करने लगा, उसके जिद्द को यह कह कर माँ टालती गयी कि अभी दो दिन बाकी है पिताजी लेकर आयेंगे, यह सुनकर सुखु के चेहरे खिल उठते खुशियों से कूदने लगता चिल्लाने लगता हम भी ढेर सरे पटाखे छोडेंगे।दीपावली के सुबह सुखु उठता है। माँ से पूछता है माँ पिता जी आये माँ निरुत्तर हो जाती है। सुखु कहता है माँ आज ही दीपावली है। सबों का पटाखा आ गया है, मेरा भी आ जायेगा न, माँ फिर भरोसा दिलाती हैकि हाँ शाम तक तुम्हारे पिता जी लेकर आ जायेंगे। यह सुनकर कूदने गली में जाता है अपने दोस्तों को कहता है हमारा भी फटाखा शाम तक पिताजी लेकर आयेंगे।इसी बीच खबर आती है कि सुखु के पिताजी नहीं आ पाएंगे क्योंकि जहाँ वह काम करते थे पैसा नहीं मिल पाया था यह सुचना पाकर सुखु कि माँ बहुत मायूस हो गयी, एक तरफ पटाखा के बच्चे का जिद्द और दुसरे तरफ घर में खाने के लिए एक छटाक अनाज नहीं, बडी मुश्किल हो गयी, सुखु का जिद्द तो पूरा करना असंभव है, रहा किसी तरह घर में चूल्हा जलाना वह तो सेठ जी से उधार लेकर भी कर लूंगी, यही सोच में बैठी रही। संध्या होने वाला था इसी बिच सुखु फिर माँ के पास आकर कहता है। माँ पिताजी कब आयेंगे शाम होने जा रहा है कब पटाखा आएगा, कब छोदुँगा। कभी माँ का गाल पकड़कर उत्तर चाह रहा था कभी उनके माथे का बाल नोच कर उत्तर चाह रहा था, पर उसकी माँ चुपचाप मूर्ति की तरह बैठी थी। उत्तर न मिलने पर सुखु हाथ, पैर पटककर रोने लगा, तब माँ बोले बेटा अभी में जाकर ला देती हूँ।सूर्यास्त हो चूका था सभी के मकानों पर दीपक जलाने की तैयारी हो रही थी, सुखु की माँ हाथ में झोला लिए सेठ जी के दूकान पर जाती है कहती है सेठ जी सुखु के पिताजी नहीं आ पाए हैं। घर में खाने के लिए एक छटांक अनाज नहीं थोडा नहीं है थोडा उधार दे दें तो उनके आने पर पैसा दे देंगे। यह सुनते ही सेठ जी आगबबूला हो गया कहने लगा कि पहले का पैसा तो मिला नहीं अब कहाँ उधार दूंगा। सुखु की माँ कहने लगी कि सेठ जी आज पर्व का दिन है, विश्वास दिलाती हूँ कि उनके आते ही सबसे पहले आप का ही क़र्ज़ चूका दूँगी। लाख समझाने के बाद सेठ जी नहीं माने बेचारी उदास होकर घर लौटने लगी, मन ही मन सोच रही थी कि हम तो भूखे रह सकते हैं मेरा सुखु कैसे भूखे रह सकता है, जैसे ही अपने घर के दरवाजे पर पैर राखी वैसे ही सुखु दौड़ता हुआ आया कहने लगा माँ फटाखा लायी कभी माँ के कमर को देखता जब कही नजर नहीं पडा तो रोने लगा बच्चा को रोते देख मनो उसकी माँ का कलेजा ही दो फांक हो गया।गाँव में फटाखा छोड जाने लगे फट फट ,सर सर कि आवाज गूंजने लगी सुखु रोते हुए कहने लगा माँ सभी फटाखे छोड़ रहे हैं हम कब छोडेंगे। माँ दिलासा दिलाती रही सुखु रोता रहा यह क्रम नौ बजे रात्रि तक चलता रहा। सुखु रोते रोते सो जाता है। भूख की चिंता न थी न आज उसे लगा। सुखु कि माँ भी किवाड़ बंद कर बेटे को कलेजे से लगा कर सो जाती है।सुबह छः बजे सुखु की माँ की नींद खुलती है। नींद खुलते सुखु को न देख घबडा जाती है। चारो तरफ नजर दौड़ने लगती है, घर का किवाड़ खुला, सुखु नहीं और भी बेचैनी बढ़ी। इसी बीच पहने हुए कुरता में कुछ लेकर सुखु आता है , माँ दौडी बेटा कहाँ चला गया सुखु ने कुरता में लाये चीजों को दिखाते हुए कहा माँ यह फटाखा हिया। माँ बोलती है नहीं बेटा यह फटाखा नहीं, छूटा फटाखा है।

Wednesday, February 25, 2009

पहली मुलाकात

सन 1972 की बात है जब पहली बार मेरी श्री लालू प्रसाद से मुलाकात हुई थी। उस समय मैं अनुग्रह नारायण महाविद्यालय में आई0ए0 का छात्र था, छात्रों पर प्रबन्धक एवं प्रधानाचार्य समर्थक छात्र समूह द्वारा प्रताड़ना दी जाती थी। छात्रों के समस्याओं को भय से दबा दिये जाते थे, छात्र चाह कर भी अपनी समस्याओं के समाधान के लिये बात नहीं उठा सकते थे। उठाने वाले छात्रों को एक ख़ास समूह के छात्र द्वारा उनके इच्छाओं को दबवा दिया जाता था। छात्र मानों बिल्ली के तरह कालेज जाते, वर्ग करने चले जाते सक्रिय तेज तर्रार छात्रों पर फ़ब्तियां कसी जाती थी, कभी कभी कार्यरत दबंग कर्मचारियों एवं उनके समूह के छात्रों द्वारा ख़ुलेआम अन्य छात्रों की पिटाई कर दी जाती थी, बेचारे छात्र पिटाई एवं अपमान को सहकर भी अपनी पढाई कर लेना चाहते थे।
छात्र समूहों के इस तरह की कार्रवाई असह्य होती जा रही थी, अंदर ही अंदर प्रतिरोध की ज्वाला फ़ूट रहे थे, प्रतिरोध के नेतृत्व करने वाले छात्रों का तलाश चल रहा था।
लीजर का समय था, चार पांच छात्र कालेज परिसर के मैदान के एक छोर पर ख़ड़ा होकर इन्हीं मसलों पर आपस में चर्चा कर रहे थे। जो मैं सोचा करता था, हु-बहु बात करने वाले अन्य छात्र भी सोच रहे थे, तय हुआ छात्रों के मनोभाव्ना को समझ कर गुप्त रुप से अन्य छात्रों से बातें होने लगीं पर मन में भय भी सालता जा रहा था कहीं दबंग छात्र जो प्रबन्धन के पक्ष में हैं या जो अपनी दबंगता बनाये रख़ना चाहते हैं मालुम हो जायेगा तो लेनी की देनी हो जायेगी।
गुप्त रुप से छात्रों के अंदर झांकने का कार्य शुरु हो गया, कालेज परिसर के कोने में कानाफ़ुसी, इशारे होने लगे, जब मौका मिले किनारे ख़ड़ा होकर छात्रों के मन की बात जानना एवं समझना शुरु किया जाने लगा। बात के समय मन को भी टटोलना, उनके हिम्मत को भी तौलना, संघर्ष के समय किस दूरी तक साथ रहने की क्षमता को भी समझना चलता रहा।
कई दिनों तक यह सिलसिला चलता रहा, अन्ततः यह एहसास होने लगा कि छात्रों के मन में अंदर ही अंदर गुस्से की ज्वाला फ़ूट रही है, अपमान, अत्याचार एवं समस्याओं के ख़िलाफ़ आंदोलन एवं संघर्ष करने का, हर दूरी तय करने को तैयार हैं चाहे नतीजा जो हो, भुगतने को भी तैयार हैं।
छात्रों के 11 सदस्यीय स्टेयरिंग कमेटी बना दी गयी थी, जिसमे मेरे अलावे पांडे, भुपेंद्र कुमार, शैलेंद्र कुमार, शशिकांत तिवारी, उमेश नंदन सहाय, भूषण यादव, ध्रुव नारायण, शंभुनाथ मिश्रा इत्यादि थे। बैठकों का दौर शुरू हो गया, कालेज पर दबदबा रख़ने वाले छात्रों के दबंगता को समाप्त करने के लिये आंदोलन का रुप रेख़ा तैयार होने लगा। मांग पत्र बनने लगे, जिसमें छात्र संघ का चुनाव, बुक बैंक से किताबें, छात्रों पर हो रहे दमनकारी नीति को समाप्ति के अलावे कई मांग पत्र को सूची बद्ध किये जाने लगे।
छात्रों में सुगबुगाहट की आहट होने लगी, आहट कालेज प्रशासन तक पहुंचने लगी, प्रशासन निश्चिंत लग रहा था, उनको विश्वास था कि इस कालेज के छात्र साहस कर ही नहीं सकते। कोई करना चाहेगा तो दबाने में एक क्षण की भी देर नहीं की जायेगी। कोशिश भी की गयी, डराने का, धमकाने का, तोड़ने का पर छात्रों के मिजाज पर असर न देख़कर थोड़ी प्रधानाचार्य की निश्चिंतता कमी फ़िर भी मन और मिजाज में बदलाव नहीं दिख़ रहे थे।
एक दिन हिम्मत करके कालेज परिसर में ही छात्रों की बैठक बुलाई गयी। बैठक की सूचना जैसे ही चल रहे वर्गों में गया वर्ग त्याग कर छात्र बैठक में शामिल होने के लिये आने लगे। परिसर छात्रों के भीड़ से भर गया एवं वर्ग ख़ाली हो गया।
छात्रों के संगठित एकता एवं उनके आंख़ों मे कुछ कर गुजरने को देख़ते हुए प्रधानाचार्य ने वार्ता के लिये बुलाया, पर वार्ता में बात और बिगड़ गयी। नतीजा दुसरे दिन से वर्ग स्थगित, आंदोलन तेज, कालेज में प्रधानाचार्य का आना बंद। तब अपनी मांगों पर दवाव डालने के लिये कालेज के कुछ ही दूरी पर प्रधानाचार्य का निवास स्थान, हजारों छात्रों ने जुलूस के शक्ल में उनके निवास स्थान पर अपनी एकता का अहसास कराने के साथ मांगों के पूर्ति के लिये दवाव बनाने के लिये पहुंचा, पर जैसे ही जुलूस निवास स्थान पर पहुंचा, प्रधानाचार्य के पुत्र राइफ़ल निकालकर छात्रों को भाग जाने को कहा और नहीं भागने पर गोली चला देने की धमकी दिया गया। बस क्या था भगदड़ हो गयी, उस समय राईफ़ल निकाल देना, दिख़ा देना बहुत बड़ी बात थी। छात्र भयभीत हो गये, इतने भयभीत कि लगा आंदोलन यही ख़त्म हो जायेगा, कुछ स्थिति ही ऐसी बन गयी थी।
इस घटना के बाद संध्या समय स्टेयरिंग कमिटी की बैठक बुलाई गयी, कमिटी को चारों तरफ़ अंधेरे से दिख़ाई दे रहे थे, रास्ता दिख़ाई नहीं दे रहा था। क्या किया जाये, छात्रों के बीच में भय और दहशत का वातावरण उत्पन्न हो गया था। उन्हें लग रहा थाअ कि हमलोग कालेज प्रशासन, प्रधानाचार्य और उनके पुत्र को चुनौती नहीं दे सकते हैं। संघर्ष समाप्त सा नजर आ रहा था। इसी बीच मैंने श्री लालू प्रसाद जो उस समय छात्र नेता के रुप में काफ़ी लोकप्रिय थे उनसे मिलकर मदद देने की गुहार लगाने की बात की, बैठक में शामिल अन्य लोगों की सहमति बनी कि कल उनसे दोपहर में मुलाकात किया जाये।
दोपहर का समय गर्मी के लहलहाती धूप और उसमें पछिया हवा मानों गला सूख़ रहे हों फ़िर भी पुनाईचक में हमसब इकट्ठे होकर पैदल ही भेटनरी कालेज का वह चपरासी आवास जहां श्री लालू प्रसाद रहते थे मिलने चला, हम सबों में से किसी ने न तो इनके आवास को देख़ा था और न उनको, पर उनके आवास की जानकारी हर छात्र को था। लोकप्रियता इतनी थी कि छात्रों के बीच में चौक चौराहों, चाय दुकानों और इस इलाके के मुहल्लों में लालू प्रसाद का नाम हरलोगों के जुबान पर रहा करता था।
पुछते-पुछते भेटनरी कालेज गया, पहुंचने के पश्चात उनके आवास की जानकारी ले ही रहे थे कि इस बीच एक दुबला-पतला लुंगी और गंजी पहने व्यक्ति अकस्मात भोजपुरी भाषा में पुछ बैठता है- का बात है, कहां से आइल बार, केकरा से मिले के बा। हमलोगों ने बताया कि पुनाईचक से आये हैं और हमलोग ए0 एन0 कालेज के छात्र हैं। श्री लालू प्रसाद से मिलने आये हैं। इतना सुनते ही वह व्यक्ति इशारे में चलने को कहा। एक छोटा सा कमरा, दीवार से सटाकर एक टेबुल जिसपर कई टेलीफ़ोन रख़े थे। कमरे में जाने के बाद उस व्यक्ति से हमलोगों ने कहा कि हमें श्री लालू प्रसाद से मिला दें। तब वह व्यक्ति बोला हमहीं हईं लालू प्रसाद , यह सुनकर ऐसा लगा कि हमलोगों को मूर्ख़ बनाया जा रहा है।
इस व्यक्ति के पैर में तो टूटे चप्पल हैं, लुंगी और गंजी पहने कोई सामान्य व्यक्ति है, जो लालू प्रसाद के नामपर हमें मूर्ख़ बनाना चाह रहा है। लालू प्रसाद जैसा लोकप्रिय छात्र नेता इस वेशभूषा में हो ही नहीं सकता।
यह सोच ही रहा था कि पुनः वह दुबला पतला साधारण व्यक्ति पुछता है कि जल्दी बोल अपन बात, हमलोगों ने पूरी घटना का जिक्र किया, किस तरह जुलूस पर प्रधानाचार्य के पुत्र ने राईफ़ल निकाली और मार देने की धमकी दी। यह सुनकर उनके आंख़ें तनने लगे, शरीर में तेज दिख़ने लगे, स्फ़ुर्ति दिख़ने लगे। कहा गया कल 11 बजे जुलूस निकालो हम आयेंगे। देख़ते हैं किसमें इतना ताकत है। छात्रों को धमकाने एवं डराने की। तब पूर्ण एहसास हो गया कि जिस व्यक्ति से बात कर रहा हुं वह सामान्य होते हुए संघर्ष , लोकप्रियता में असामान्य व्यक्ति कोई और नहीं श्री लालू प्रसाद हैं।
प्रातः 6 बजे से ही वर्ग प्रारंभ हो जाता था उसी समय से ही हर वर्ग में छात्रों को सूचित किया जाने लगा कि आज 11 बजे लालू प्रसाद हमलोगों के जुलूस को संबोधित करने आयेंगे यह सुनकर छात्रों में दस गूणा ऊर्जा भर गया। जुलूस के साथ जाने के लिये निश्चित समय एवं स्थल पर सभी छात्र इकट्ठे हो गये। जैसे प्रधानाध्यापक के निवास स्थल पर जुलूस गया वैसे ही श्री लालू प्रसाद का आगमन होता है। एक चाहरदीवारी पर जोशीला भाषण होते हैं। आंदोलन को ताकत एवं मजबूती मिली। अन्ततः सफ़लता भी मिली। महाविधालय में सभी छात्रों को बराबर एक समान देख़े जाने लगे, न कोई अपमानित हो रहे है, न कोई प्रताड़ना, न किसी ख़ास समूह के दबंगता चल रही है। न कोई ख़ास समूह वर्चस्व बनाने का प्रयास्।
यही है श्री लालू प्रसाद से पहली मुलाकात्।

डा0 निहोरा प्रसाद यादव
प्रांतीय महासचिव, राष्ट्रीय जनता दल, बिहार

जननायक की यादें

प्रत्येक दिन जब वे पटना में रहते थे, सुबह साढे सात बजे मिलने जाया करता था। ठीक साढे सात बजे तैयार होकर जननायक अपने सरकारी आवास के नीचे बरामदे पर लगे कुर्सी, बड़े से टेबुल, जो कहीं कटे, कहीं टूटे थे आकर बैठ जाते और गरीबों के हुजूम जिनके तन पर साफ़ कपड़े नहीं, कईयों के पैर में चप्पल नहीं आकर घेर लेते, अपना दुख़ड़ा, तकलीफ़ पीड़ा सुनाने लगते। उसी भीड़ में दल के कार्यकर्ता एवं उनसे मिलने वाले सहयोगी टेबुल के बगल में लगे बेंच पर बैठ जाते, समस्याओं से सम्बन्धित अधिकारियों, सरकार के मंत्रियों को दूरभाष के द्वारा या फ़िर पत्र के द्वारा न्याय देने का निवेदन किया करते थे। वे आने वाले लोगों का बड़े नम्र भाव से यह भी समझाते थे कि जब हम आपके यहां आने वाले हैं तो पैसा ख़र्च कर क्यों चले आये। वहीं आकर अपनी समस्याओं को बताते।
पटना में रहने पर देर रात भी उनसे मिलने जाया करते था। अपने आवास के उपर बरामदे में लगे चौकी पर लेटे रहते। माथे और शरीर दबाने वाले दबाते रहते थे। चौकी के सटे लकड़ी का टेबुल जिसपर बैठने का निर्देश मिलता, हाल चाल होता। अगले दिन के कार्यों के लिये भी निर्देश होता।
एक रात जब उनसे मिलकर चलने का आदेश लेना चाहा तो निर्देश हुआ कि छः बजे आ जायें। मुझे लगा सुबह कहीं कार्यक्रम में जाना है। चुंकि अक्सर मुझे अपने साथ ले जाया करते थे, इसलिये मैं भी तैयार होकर ठीक 6 बजे सुबह पहुंचकर जैसे ही मोटरसाईकिल बन्द कर ख़ड़ा करने लगा वैसे ही जननायक की आवाज, चलिये। अचरज भरे निगाह से देख़ा। दबे आवाज में मैने प्रश्न किया गाड़ी तो अभी आयी नहीं है, उन्होंने कहा कि आप के मोटर साइकिल से ही चलेंगे। यह सुनकर मैं हतप्रभ रह गया, मानों सारे शरीर का ख़ून ही जाम हो गया हो। थोड़ी देर के लिये शून्यता की स्थिति में चला गया, फ़िर उन्होंने आवाज दी- स्टार्ट करिये। बड़ी हिम्मत और साहस और अपने आप को नियंत्रित करते हुए मोटर साइकिल स्टार्ट किया। बैठने के क्रम में पीछे लगे कैरियर से उनके पैर छिल गये। मैंने अफ़सोस एवं दुख़ प्रकट किया लेकिन उन्होंने कहा मेरा कद छोटा है इसलिये ऐसा हुआ, चलिये कोई बात नहीं। बैठने के बाद दोनों हाथ मेरे कंधों पर, आदेश हुआ बेली रोड से चलने का।
उस समय अजीबो गरीब स्थिति में था जब सड़क से चलने वाले, पैदल हों या गाड़ी से हों, साइकिल से हो सभी लोग जननायक को मोटर साइकिल से जाते देख़कर अविश्वसनीय नजरों से देख़ रहे थे। मानों विश्वास ही नही हो रहा था कि इतने बड़े राजनेता मोटर साइकिल से चले यह नहीं हो सकता। आपस में तर्क वितर्क, सही गलत होने लगी। कईयों ने उंगली से इशारा कर बताना चाहा कि देख़ें कर्पूरी ठाकुर मोटर साइकिल से जा रहे हैं। कईयों ने सर झुकाकर अभिवादन किया, कईयों ने हाथ उठाकर प्रणाम किया।
चलने के क्रम में ही उन्होंने बताया कि कई दिनों से विदेश के कुछ पत्रकार मुझसे मिलने आये हैं पर समय न रहने के कारण उन्हें प्रेसीडेंट होटल में ठहरने का आग्रह किया और उन्हें वादा किया था कि सुबह छः बजे मैं स्वयं होटल में ही आकर बात कर लूंगा।
जैसे ही होटल के पास मोटर साइकिल रुकी, जननायक को देख़कर लोग दौड़ने लगे, होटल के प्रबंधक एवं कर्मचारियों ने आकर अभिवादन किया। जब विदेशी पत्रकार को जानकारी मिली कि जननायक दिये गये समय पर आ गये वह भी मोटर साइकिल से तब अकस्मात उनके मुंह से निकल गया- “You are really a leader of down trodden people. We have not seen any leader as you in the entire world”।
अपने विशाल व्यक्तित्व एवं बड़े राजनेता होने का एहसास गरीबों के आवाज बनने में कभी और कहीं भी बाधक नहीं माना, यही कारण रहा कि गरीबों के आवाज को मजबूती प्रदान करने में साधन नहीं, अपने आपको साध्य मानकर आगे बढते गये। लक्ष्य तक पहुंचने में रास्ते चाहे जैसा हो इसकी परवाह नहीं की। न रात देख़ा न दूरी देख़ी, न साधन देख़ा न मुसीबतें देख़ी, निर्भिक होकर सीना फ़ैलाकर, पैर अड़ाकर लड़ने और संघर्ष से तनिक भी नहीं रुके। पूरी जिंदगी ही मानों गरीबों, असहायों, वंचितो के लिये गिरवी रख़ दी हो। ऐसे जन नेता को शत शत नमन।

डा0 निहोरा प्रसाद यादव
प्रांतीय महासचिव, राजद
पटना, बिहार